अरे मन! भज नित नन्दकिशोर।
ललित त्रिभन्ग मनोहर छविमय ऋषि-मुनि-मानस-चोर॥
अतुलित परम प्रेम-रस-निधि, नित नव माधुर्य-निधान।
अति उदार सौन्दर्य-सुधार्णव सच्चित्-सुखकी खान॥
सहज विरक्त ज्ञानि-मुनि-मन आकर्षक अँग-प्रत्यंग।
उदित रूप-रवि जहाँ, वहाँ मर चुका तमिस्र अनंग॥
भोग-रोग कर त्याग, सदा जो दुःखद और अनित्य।
श्याम-रूप-वर-सुधा-तरंगिणिमें कर मज्जन नित्य॥
हर एक लम्हा खयाल उसका दिल ने उठाया है सवाल उसका
किसका?
मेरे साँवरे सरकार का जी!
तुझे देखा साँसें अब आतीं अब कम
धडकनें रुक गईं निकले न दम
श्याम सोणे मुखड़े बनाता है जी कम
मर मिटा तुझ पर भूल गए हम
दिल गया दिल गया ले गया सनम

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