कृष्ण और आधुनिक विज्ञान

         
ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द विग्रहः। 
अनादिरादिर्गोविन्दः सर्व कारणकारणम्॥ब्रह्मसंहिता ५.१॥ 
         

"ईश्वर परम कृष्ण है अर्थात ईश्वर कृष्ण से भी कृष्ण महान कृष्ण वर्ण (श्याम वर्ण) के हैं। वे सच्चिदानन्द का विग्रह हैं अर्थात सत, चित, आनन्द जिसमे सदैव नित्य रहता है। इन गोविन्द स्वरुप ईश्वर का कोई आदि और अन्त नहीं और समस्त जग के कारणों के भी मूल कारण हैं।"

यह वह सत्य है जिसे सनातनी वैदिक ऋषियों (वर्तमान संज्ञा: वैज्ञानिक) ने आज की गणना से अनादि काल में ही खोज लिया था। समस्त संसार का मूल वही श्याम-विवर/श्याम-पिण्ड है जिसे वेदों में घनश्याम परात्पर भगवान् कहा गया है। घनश्याम अर्थात जो सघन है और श्याम है: यही व्याख्या वर्तमान वैज्ञानिकों ने श्याम-विवर के विषय में की है। समस्त ब्रह्माण्डों से परे एक महान (अतिदीर्घ परिधि वाला) श्याम-विवर स्थित है जो परात्पर भगवान् का स्वरुप है। सदैव स्थिर है। कभी अंत नहीं होता। कभी आरम्भ नहीं होता। 

         
न तद्भासयते सूर्यो न शशान्को न पावकः। 
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम्॥श्रीमद्भगवद्गीता १५.६॥
         



"श्री कृष्ण का वह परम धाम न तो सूर्य से प्रकाशित है न चन्द्र से और न ही अग्नि से। जो लोग वहाँ पहुँच जाते हैं, वे इस भौतिक जगत में फिर से लौट कर नहीं आते।"

प्रत्येक श्याम विवर की यह विशेषता है कि जो भी वस्तु उसके समीप या अन्दर जाए वह कभी वापिस नहीं आती इसे ही मोक्ष कहा गया

         
शिवोऽहं  शक्तिश्च एकाद्द्वौ भवामि कालयोगेन। 
प्रकृत्याःपुरुषस्य रूपे कृणोमि संसार सागरं॥आदित्यस्मृति॥  
         
"वह परमात्मा शिव (पुरुष) और शक्ति (प्रकृति) का रूप धारण कर संसार की रचना करता है।"

वही कृष्ण ही महान विस्फोट का रूप धारण करते हैं और उर्ध्वाधर शक्तिधारा (शिव लिंग) एवं क्षैतिज वलय चक्रों के रूप में ब्रह्माण्ड में विस्तार करते हैं और इस संसार की रचना करते हैं, इस घटना को वर्तमान वैज्ञानिकों ने 'महान विस्फोट' कहा। 

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