"राधा"
राधा पूज्या च कृष्णस्य तत्पूज्यो भगवान् प्रभुः।
परस्पराभीष्टदेवो भेद्कृन्नरकं व्रजेत॥
[श्री राधिकाजू एवं श्री कृष्ण एक दूसरे के परस्पर पूज्य और अभीष्ट देव हैं, इनमे कोई भेद नहीं। राधा ही कृष्ण हैं और कृष्ण ही राधा। इन दोनों में भेद करने वाला अधम मनुष्य अवश्य ही नरक का भागी होता है।]
राधा मूल प्रकृति, कृष्ण की आत्मा, शक्ति स्वरूपा, महान गोपी तत्व हैं। नित्य निकुञ्ज गोलोक धाम में विरजा नदी के किनारे रासमण्डल में श्रीकृष्ण के साथ विराजतीं हैं।
राधा स्वयं जगन्माया हैं और कौस्तुभ मणि के रूप में श्री कृष्ण के वक्ष स्थल पर शोभा पातीं हैं। उन्हीं माया देवी के प्रभाव से श्री कृष्ण जगन्मोहन कहलाते हैं।
राधा गोपी भाव है। वह कृष्ण परमात्मा है और हम सब उस परमात्मा के अंश आत्माएं। आत्मा की चेतना में जब परमात्मा से मिलन की उत्कट अभिलाषा उत्पन्न होती है तब आत्मा गोपी भाव को प्राप्त हो उस परम ज्योति स्वरुप को कान्त भाव से प्रेम करने लगती है। भगवान् और भक्त दोनों परस्पर एक होने के लिए आगे बढ़ते हैं। विभिन्न लीलाएं करते हुए एक हो जाते हैं। राधा भाव के बिना कृष्ण प्राप्ति नहीं हो सकती।

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