निकुञ्ज में विराजे घनश्याम राधे राधे
श्री वृन्दावन के कुञ्ज में भ्रमर करत गुञ्जाय
दुल्हिन प्यारी राधिका ये दूल्हो नन्दकुमार...
मनमोहन!
ये जो प्रिय प्रीतम निकुञ्ज में विराजमान हैं! एक से बढ़कर एक दोनों! ये हमारे मनमोहन ये हमारे कन्हैया जो हमारा मन मोह लेते हैं इसीलिए इन का नाम चित्तचोर है!
मनमोहन मनमोहना मनमोहन मन माहि!
और मनमोहन सो सोहना इस तीन लोक में नाहि!
निकुञ्ज में विराजे घनश्याम राधे राधे
ये मनमोहना निकुञ्ज में किशोरी जी के संग विराजमान है और जब ये मनमोहन बन्सी बजा के ब्रज में डोले है, इसके बड़े बड़े नैन देख कर सखियों का क्या हाल होता!
मनमोहन मनमोहना ये तो सुन्दर श्याम सुजान
ममोहना सुन्दर श्याम सुजान जब इठला के बलखा के एक हाथ में बाँसुरी ले के बाँसुरी में सखियों के नाम पुकारते हैं!
मनमोहन मनमोहना ये तो सुन्दर श्याम सुजान
ब्रजबाला सब लुट गईं ए री बिना जान-पहचान!
ब्रजबाला न ठाकुर को जानती न चीनतीं! ब्रज में ब्याह के आईं, बस ठाकुर का नाम सुना लेकिन जब ठाकुर के दर्शन किये तो सब उनकी बलिहारी हो गईं! अपना चित्त मनमोहन को दे बैठीं!
जब दिल दे दिया तो ठाकुर हमारे हो गए
हम उनके हो गए
मेरे प्यारे मोहना मैं पलक झाँप तोहे लेऊँ
न मैं देखूँ और को ए री न तोहे देखन देऊँ
निकुञ्ज में विराजे घनश्याम राधे राधे
जय राधे राधे राधे जय राधे राधे राधे!
जय राधे राधे राधे जय राधे राधे राधे!
आदित्य श्रीराधेकृष्ण सोऽहं

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